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क्या Japan से छोड़ा रेडियोएक्टिव पानी समुद्र को हजारों साल के लिए विषैला बना देगा?

राष्ट्रीय

Updated Sat, 17 Apr 2021 13:35 IST

क्या Japan से छोड़ा रेडियोएक्टिव पानी समुद्र को हजारों साल के लिए विषैला बना देगा?

जापान के फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट से प्रशांत महासागर में पानी छोड़ने के फैसले पर चीन काफी भड़का हुआ है. उसने जापान को चेतावनी के अंदाज में बताया कि अगर ऐसा हुआ तो अंजाम बुरा होगा. वैसे जापान का कहना है कि उसने पर्याप्त शोध के बाद पानी समुद्र में छोड़ने का तय किया. उसने आश्वस्त भी किया कि इससे समुद्री जीवों और मछुआरों को कोई खतरा नहीं. हालांकि जापान का ये आश्वासन चीन के डर को कम नहीं कर पा रहा.
दशकभर पहले जबर्दस्त सुनामी के बाद फुकुशिमा परमाणु संयंत्र तबाह हो गया था. इसके बाद से वहां 10 लाख टन से ज्यादा रेडियोएक्टिव पानी जमा है, जिसे अब समुद्र में बहाने की बात हो रही है. संयंत्र से पानी समुद्र में छोड़ने के पीछे आगामी टोक्यो ओलंपिक खेल हैं. खेल की जगह फुकुशिमा से लगभग 60 किलोमीटर दूर है. ऐसे में दुनियाभर से आए खिलाड़ियों को किसी दुर्घटना का डर हो सकता है. इसी डर को खत्म करने के लिए जापान सरकार रेडियोएक्टिव पानी को समुद्र में बहाने की बात कर रही है.
इसी मंगलवार को सरकार ने पानी को समुद्र में बहाने की योजना को मंजूरी देने की आधिकारिक घोषणा की. योजना के अनुसार समुद्र में डालने से पहले पानी को साफ किया जाएगा. सरकारी दावों के मुताबिक ये इतना साफ होगा कि उसमें रेडिएशन बाकी नहीं रहेगा. लेकिन इसपर केवल चीन ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को चिंता है कि रेडियोएक्टिव तत्व अगर बहते हुए उनके देश पहुंच गया तो नतीजे घातक होंगे.

जापान के मछुआरे कर रहे विरोध 
सरकारी आश्वासन के बाद भी खुद जापान के मछुआरे भी पानी छोड़ने का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे उनका व्यापार ठप हो जाएगा. बता दें कि पहले से ही जापान में समुद्री जानवरों को नुकसान पहुंचाने के कारण जापानी मछुआरे कुख्यात रहे. कड़े नियमों के साथ काफी मुश्किल से उन्होंने अपनी छवि बदली. इसके बाद भी काफी सारे देश फुकुशिमा से आने वाली मछलियां या दूसरा सी-फूड नहीं खरीदते हैं. अब रेडियोएक्टिव पानी बहाने से न केवल समुद्री जंतुओं को नुकसान होगा, बल्कि मछुआरों का काम बंद हो जाएगा क्योंकि कोई भी उनके पास से जहरीले सी-फूड नहीं खरीदना चाहेगा.

कितने घातक हैं रेडियोएक्टिव तत्व
रेडियोएक्टिव पानी को समुद्र में छोड़ने से पहले ट्रीट किया जाएगा ताकि उसका घातक असर कम हो सके लेकिन तब भी वो इतना खतरनाक होगा कि समुद्र के पानी को जहरीला बना दे. रेडियोएक्टिव वेस्ट परमाणु बिजलीघरों में परमाणु ऊर्जा तैयार करने के दौरान तैयार होता है. इसमें प्लूटोनियम और यूरेनियम जैसे खतरनाक तत्व होते हैं.

क्या करते हैं ये रेडियोएक्टिव तत्व 
ये ऐसे तत्व हैं, जिसके संपर्क में आते ही कुछ ही दिनों के भीतर स्वस्थ से स्वस्थ इंसान दम तोड़ देता है क्योंकि ये सीधे खून से प्रतिक्रिया करते हैं. इसके अलावा धीमी गति से क्रिया करने पर भी ये स्किन, बोन या ब्लड कैंसर जैसी घातक बीमारियां देते हैं.
खतरा सैकड़ों-हजारों सालों तक रहता है
रेडियोधर्मी कचरे के साथ दूसरी बड़ी समस्या है कि ये पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकते. कचरे के स्रोत के आधार पर, रेडियोधर्मिता कुछ घंटों से सैकड़ों सालों तक रह सकती है, जिसके बाद इसका घातक असर कम होता है. यही वजह है कि इसके खतरे के आधार पर ठोस और तरल कचरे का निपटान अलग तरह से होता आया है. ठोस को सावधानी से ऐसी जगह पर और इस प्रकार से गाड़ा जाता है कि उससे निकलने वाली हानिकारक विकिरण व अन्य कण कम से कम हानि पहुंचा सकें और उसमें कोई रिसाव न हो.


अब तक हो रही है स्टडी

अब अगर जापान के परमाणु संयंत्र के कचरे की बात करें तो ये तरल रूप में है. इसमें रेडियम 226 जैसे खतरनाक तत्व है. ये कार्सिनोजेनिक होता है जो सीधे शरीर में जानकर डीएनए से क्रिया करता है और उनमें बदलाव लाता है. इसके नतीजे इतने खतरनाक हो सकते हैं कि वैज्ञानिक अब तक इसपर पूरी स्टडी भी नहीं कर सके हैं. कैंसर इसका सबसे छोटा रूप हैं. इसके अलावा भी शरीर में भयंकर विकृतियां आ सकती हैं.

समुद्री जीव-जंतुओं पर भी असर

इसका असर समुद्री जीव-जंतुओं पर भी उतना ही भयंकर होगा. लाखों सी-एनिमल की मौत हो जाएगी और जो बचेंगे, वे लंबे अरसे तक जहरीले तत्वों के साथ रहेंगे. इससे अगर कोई रेडियोएक्टिव पानी में रहने वाली मछलियां या दूसरे जंतु खाए, तो उसकी सेहत भी खतरे में आ जाएगी.